घर की सिलाई और छत का पानी · 4 मिनट 40 सेकंड
छत की चाबी और पहली बूँद

मेज़ पर लाल बनारसी रेशम का आख़िरी थान फैला था। कल सुबह ग्यारह बजे उससे दुल्हन का ब्लाउज़ बनना था। तभी सीढ़ियों पर पानी उतरने की आवाज़ आई, और छत का ताला बंद था।
छत की चाबी और पहली बूँद
लाल बनारसी सिल्क और छत की टप-टप
आसमान पीतल के पुराने बर्तन जैसा मटमैला था। हवा इतनी भारी कि साँस भी सोचकर लेनी पड़े। मीना की मेज़ पर लाल बनारसी सिल्क का थान खुला था।
कल सुबह ग्यारह बजे पार्षद जी की बेटी को इसका ब्लाउज़ पहनना था। बाज़ार में यह रंग, यह बुनावट दोबारा नहीं मिलनी थी। मीना ने सफ़ेद खड़िया से गले की बारीक लकीर खींची। इस रेशम पर कैंची ज़रा भी बहकी, तो तीन महीने की कमाई और बरसों की साख, दोनों जातीं।
तभी ऊपर जीने से एक आवाज़ आई। पहले धीमी टप-टप। फिर पत्थर की सीढ़ियों पर पानी के फिसलने की सरसराहट।
मीना का हाथ कैंची पर ठिठक गया। छत की टंकी का ओवरफ़्लो कल से अटका था, और पानी अब सीधे उस लकड़ी की शेल्फ़ की तरफ़ बढ़ रहा था जहाँ बाकी कच्चा रेशम और ज़री के लच्छे रखे थे।
मीना ने खिड़की से सिर निकाला। "राजू! अरे ओ राजू! जीने में पानी आ रहा है!" नीचे गली में राजू दूध का ख़ाली डोल लिए जा रहा था। उसने ऊपर देखा। "मीना बाजी, छत की चाबी तो लाला जी की खूँटी पर है! अभी लाता हूँ!"
मकान लाला जी का था, और छत की चाबी हमेशा उनकी दुकान में रहती थी। आज पहली बार मीना को यह इंतज़ाम बहुत दूर लगा।
जंग लगा ताला और नीला छाता
मीना ने लोहे का भारी पैमाना रेशम पर रखा, ताकि पंखे की हवा उसे न उड़ाए, और नंगे पैर सीढ़ियाँ चढ़ गई।
छत के दरवाज़े की जाली से झाँका तो दिल बैठ गया। नीम के सूखे पत्तों और कबूतर के परों ने नाली का मुँह बंद कर दिया था। छत पर टखनों तक पानी भरा था, और वह दरवाज़े के नीचे से रिसकर सीढ़ियों पर उतर रहा था।
दरवाज़े पर पुराना जंग लगा ताला झूल रहा था। मीना ने दोनों हाथों से खींचा। ताला हिला तक नहीं।
पानी की एक धार अब जीने के जंगले से होकर ठीक उस ताक के ऊपर गिर रही थी, जिसके नीचे रेशम की गड्डियाँ रखी थीं।
खूँटी पर अब्बा का पुराना नीला छाता टंगा था। मीना ने उसे खोला, उल्टा किया, और जंगले के बीच फँसा दिया। छाते का कटोरा बनते ही धार उसमें गिरने लगी और मुड़कर बाहर की नाली की तरफ़ बहने लगी।
"बस दस मिनट," मीना ने हाँफते हुए कहा। "दस मिनट थाम ले।" छाते की कमानियाँ पानी के वज़न से चरमरा रही थीं। दूर बादल पहली बार गरजे।
किराना की खूँटी, पीतल की भारी चाबी
किराना में दाल और मसालों की ख़ुशबू थी। लाला जी तराजू पर धनिया तौल रहे थे और पर्ची पर हिसाब मिला रहे थे। राजू को देखते ही बोले, "कल का छह रुपया बाकी है। पहले वो।"
"लाला जी, छह रुपये बाद में!" राजू ने काउंटर पर हाथ मारा। "मीना बाजी के जीने में नदी बह रही है। छत की नाली जाम है, पीतल वाली चाबी दीजिए!"
लाला जी ने चश्मा ठीक किया, खूँटी से भारी पीतल की चाबी उतारी, और थमाते हुए कहा, "ताला संभाल के खोलना, जंग खा चुका है।"
राजू चाबी लेकर गली में निकला ही था कि ठंडी हवा का पहला झोंका आया। दुकानों के तिरपाल फड़फड़ा उठे। और एक मोटी, भारी बूँद राजू के माथे पर गिरी।
मानसून आ गया था। और मीना की खिड़की खुली थी।
ईंट की चोट, चितकबरी बिल्ली
राजू जीने में घुसा तो उल्टा नीला छाता पानी के वज़न से काँप रहा था। वह छलाँगें मारता छत के दरवाज़े तक पहुँचा और चाबी ताले में डाली। चाबी घूमी नहीं। जंग ने ताले को जकड़ लिया था।
मीना ने कोने से एक पुरानी ईंट उठाकर उसके हाथ में दी। राजू ने ताले के जोड़ पर दो चोटें मारीं। खटाक। जंग की पपड़ी उड़ी, और ताला खुल गया।
दोनों ने पल्ला धकेला। राजू ने झाड़ू के डंडे से नाली में फँसा पत्तों और कीचड़ का गुच्छा खींचा। एक भँवर बना, और सारा पानी गड़गड़ाता हुआ पाइप में उतर गया। उसी पल आसमान फटा, और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।
मीना नीचे भागी। खिड़की से बौछारें अंदर आ रही थीं। कटिंग मेज़ पूरी भीग चुकी थी। और मेज़ पर रेशम नहीं था।
"मेरा सिल्क!" मीना की चीख निकल गई।
तभी कोने के लकड़ी के संदूक से एक धीमी म्याऊँ आई। मोहल्ले की चितकबरी बिल्ली बादलों की गड़गड़ाहट से डरकर कमरे में घुसी थी, और मेज़ से लटकते रेशम को पंजों से खींचकर संदूक के सूखे कोने में ले गई थी। अब वह उसी पर गोल होकर सो रही थी।
रेशम का एक कोना भी नहीं भीगा था। मीना ने माथे पर हाथ रखा, और हँसते-हँसते उसकी आँखें भर आईं।
जो बदला

