दुकान की बत्ती और कैंची की चाल · 4 मिनट 45 सेकंड
आईने पर पीली रोशनी

सैलून की बत्ती उस वक्त गई जब बाबू जी का एक कान साफ़ हो चुका था और दूसरे पर अब भी झाड़ी थी। सात बजे की बांदा पैसेंजर उन्हें साले की शादी में ले जाने वाली थी। अंधेरे में, इक़बाल चाचा ने कैंची नीचे रख दी।
आईने पर पीली रोशनी
आधे बाल और पैसेंजर ट्रेन
सैलून में कैंची की छन-छन चल रही थी, और ट्रांजिस्टर पर कोई पुराना नग़मा। बाबू जी कुर्सी पर आँखें मूँदे बैठे थे।
अचानक ट्यूबलाइट दो बार झपकी और बुझ गई। पंखा धीरे-धीरे ऐसे रुका जैसे किसी ने उसका गला पकड़ लिया हो। दीवार पर टंगे इन्वर्टर ने दो तीखी बीप मारीं, और चुप हो गया।
बाबू जी ने आँखें खोलीं। आईने में सिर्फ़ सड़क का धुंधलका था। उन्होंने घड़ी देखी और उछल पड़े। "अरे चाचा! सात बजे की बांदा पैसेंजर! साले की शादी है, मुझे ऐसे ही जाने दीजिए!"
आईने में उनका बायाँ कान साफ़ चमक रहा था। दाहिनी तरफ़ बालों का गुच्छा गाल पर झूल रहा था।
इक़बाल चाचा ने कैंची तौलिये की रेल पर टिकाई और कंघी जेब में रख ली। "पैसेंजर तो कल भी जाएगी, बाबू जी। पर एक तरफ़ कटोरा और दूसरी तरफ़ झाड़ी लेकर शादी में पहुँचे, तो समधी जी दरवाज़े से लौटा देंगे। दो मिनट टिकिए।"
बाबू जी बुदबुदाते हुए बैठ गए। चाचा ने अंधेरे में चारों तरफ़ देखा। दो मिनट में रोशनी कहाँ से आएगी, यह उन्हें भी नहीं पता था।
शीशे की चौंध
नुक्कड़ के मोड़ पर इमरान साइकिल खड़ी कर रहा था। उसने सैलून के शीशे में अंधेरा देखा, और बिना किसी के कहे किराना की सीढ़ियाँ चढ़ गया।
वह काउंटर के कोने से लाला जी की चार्जिंग लालटेन उठा लाया, वही भारी पीली लालटेन जिसकी रोशनी में लाला जी रात को हिसाब लिखते थे।
सैलून का पल्ला कोहनी से धकेलकर इमरान ने लालटेन सीधे आईने के नीचे की शेल्फ़ पर रख दी। "चाचा, फुल चार्ज! अब चलाइए कैंची।" उसने बटन दबाया।
रोशनी मदद नहीं, मुसीबत बनकर आई। साफ़ आईने से टकराकर पीली चौंध सीधे चाचा की आँखों में घुस गई।
"अरे, अंधा करेगा क्या!" चाचा ने हथेली से आँखें ढँकीं। "शीशे पर सीधी रोशनी मारेगा तो मुझे बाल दिखेंगे या तारे? हटा इसे।"
इमरान लालटेन उठाकर बाहर निकल गया। घड़ी की सुई 6:40 पर थी।
चाय की भाप, तिरछी रोशनी
इमरान मुँह लटकाए राजू की टपरी पर आ खड़ा हुआ। चूल्हे पर अदरक वाली चाय उबल रही थी।
राजू का ट्रांजिस्टर काउंटर के स्टील के डिब्बे से सटा था और खरखरा रहा था। राजू ने बिना कुछ कहे उसे थोड़ा तिरछा किया और मुँह तिरपाल की तरफ़ घुमा दिया। आवाज़ एक पल में साफ़ हो गई।
चाय का गिलास सरकाते हुए राजू बोला, "लालटेन सीधी मत मारो। चीज़ सीधे मुँह पर मारोगे तो आवाज़ हो या रोशनी, चुभेगी ही। ऊपर उछालो, बिखरकर आएगी।"
इमरान ने टपरी का तिरपाल देखा। फिर उसे सैलून की ऊँची, सफ़ेद चूने वाली छत याद आई। चाय वहीं छोड़कर वह भागा।
चूने की छत, बारात का बाजा
इस बार इमरान ने लालटेन शीशे से दूर, फ़र्श के कोने में रखी, और उसका मुँह ऊपर सफ़ेद छत की तरफ़ घुमा दिया।
रोशनी छत के चूने से टकराई और पूरे कमरे में ऐसे फैल गई जैसे सुबह आँगन में धूप फैलती है। आईने पर कोई चौंध नहीं। बाबू जी का एक-एक बाल साफ़ दिख रहा था।
चाचा ने कंघी उठाई, और कैंची ऐसे चली जैसे दर्ज़ी की सुई कपड़े पर दौड़ती है। दो मिनट में दोनों कान बराबर। फिटकरी गाल पर फेरते हुए बोले, "लीजिए बाबू जी। अब जाइए शादी में।"
बाबू जी ने बटुआ निकाला ही था कि बाहर सड़क पर ब्रास बैंड फट पड़ा: "बहारों फूल बरसाओ!" इतना बेसुरा कि सैलून का काँच थरथरा गया। हैलोजन की रोशनी से सड़क दिन जैसी चमक उठी।
पता चला, बिजली कटी ही नहीं थी। गुड्डू हलवाई की बेटी की शादी के लिए टेंट वालों ने खंभे से तार जोड़ा था, और पूरी लाइन का फ़्यूज़ उड़ा दिया था।
बाबू जी ने बाहर झाँका, और उनका मुँह खुला रह गया। घोड़ी पर सेहरा बाँधे जो दूल्हा बैठा था, वह उनका अपना साला था।
"शादी तो यहीं है," वे धीरे से बोले। "बीवी सुबह से बता रही थी कि जगह बदल गई है। मैं ही नहीं सुन रहा था।" चाचा और इमरान एक-दूसरे को देखकर ठहाका मारकर हँस पड़े।
जो बदला

