मोहल्ले का लिखा हुआ किस्सा · 4 मिनट 45 सेकंड
कल सुबह की सिलाई

घड़ी में 5:57 थे। टपरी की स्टील ट्रे पर एक गठरी रखी थी, और उसके भीतर किसी बच्ची की कल सुबह। अठारह मिनट, तीन गलियाँ, एक हरी साइकिल। हिसाब सीधा था। रास्ता नहीं था।
कल सुबह की सिलाई
अठारह मिनट का गणित
शाम ढल रही थी। राजू की टपरी पर गिलास खनक रहे थे, और काउंटर के कोने में सफ़ेद कपड़े की एक गठरी रखी थी। नीले धागे से बँधी, मीना के हाथ की गाँठ।
अंदर एक बच्ची की नई स्कूल वर्दी थी। कल सुबह असेंबली की घंटी बजते ही उसे यह पहननी थी। वरना रोल-कॉल में जिस नाम के आगे "वर्दी अधूरी" लिखा जाता, वह उसी का होता।
बच्ची के पिता 6:15 पर किराना से गठरी उठाने वाले थे, फिर रात की ड्यूटी की बस। और मीना दोपहर में ही साफ़ कह चुकी थीं: "साढ़े छह के बाद मेरा दरवाज़ा मत खटखटाना। वह वक्त मेरा है।"
इमरान ने हरी साइकिल का स्टैंड गिराया ही था कि राजू ने चाय से पहले गठरी की तरफ़ इशारा किया। "मीना की सिलाई है। 6:15 तक किराना पर। उसके बाद न बच्ची के पिता मिलेंगे, न मीना का दरवाज़ा।"
इमरान ने कलाई देखी। 5:57। अठारह मिनट। "आराम से हो जाएगा, राजू भाई।" उसने गठरी कैरियर पर कसी, चेन पर एक नज़र डाली, और पैडल मार दिया।
चेन ने कुछ नहीं कहा। अभी नहीं।
चेन, अँधेरा और एक फ़ैसला
नुक्कड़ के मोड़ पर एक गड्ढा है, जो हर साइकिल वाले को याद रहता है। इमरान को भी याद था। बस आज उससे बचने में उसने पैडल पर ज़रा ज़्यादा ज़ोर दे दिया।
एक चरमराहट हुई, और चेन दांते से उतरकर फ्रेम में जा फँसी। पिछला पहिया जाम। इमरान ने साइकिल बिजली के खंभे से टिकाई और घुटनों के बल बैठ गया। उँगलियाँ काली ग्रीस में सन गईं।
घड़ी में 6:08 थे। चेन चढ़ाने में कम से कम दस मिनट लगने थे। 6:15 अब नहीं होना था।
मोहल्ले में देर होना कोई बड़ी बात नहीं। लोग बिना बताए देर करते हैं और पहुँचकर कहते हैं, "पाँच मिनट का ही तो फ़र्क़ है।" पर उन पाँच मिनटों में कोई दुकान के बाहर खड़ा घड़ी देखता रहता है, और उसकी बस निकल जाती है।
इमरान ने गंदी हथेली बचाते हुए फोन निकाला। "राजू भाई, चेन उतर गई है। किराना को बोल दो: 6:15 नहीं, 6:25। बच्ची के पिता से पूछ लेना, वे तब तक रुक सकते हैं या नहीं।"
राजू ने एक पल नहीं लगाया। "अभी बोलता हूँ।" फोन कटा। इमरान ने चेन को फिर दांते पर चढ़ाया। वह फिर फिसल गई।
साढ़े छह से पाँच मिनट पहले
तीसरी बार में, एक पत्थर की मदद से, चेन चढ़ गई। इमरान ने हाथ पैंट पर पोंछे और साइकिल भगा दी।
किराना के बाहर बच्ची के पिता खड़े थे, थैला कंधे पर, नज़र गली की तरफ़। राजू का संदेशा उन तक पहुँच चुका था। वे बेचैन नहीं थे। उन्हें पता था कि किसका इंतज़ार है, और कब तक।
दीवार की पुरानी घड़ी ने 6:25 दिखाए, और गठरी काउंटर पर थी।
लाला जी ने बही का पन्ना पलटा और पेंसिल से लिखा: 6:25। बस इतना। गठरी पर सिर्फ़ सिलाई का नंबर था। बच्ची का नाम अंदर की पर्ची पर था, जहाँ किसी और की नज़र न पड़े।
पिता ने गठरी उठाई, हल्के से मुस्कुराए, और बस अड्डे की तरफ़ चल दिए। उनकी बस 6:45 की थी। भागने की कोई ज़रूरत नहीं थी।
इमरान ने घड़ी देखी। साढ़े छह में अभी पाँच मिनट बाकी थे।
गली के पार से तक-तक
इमरान लौटकर टपरी पर पहुँचा। राजू ने बिना कुछ पूछे साबुन की टिकिया और पानी का लोटा आगे कर दिया, फिर कड़क चाय का गिलास।
शाम गहरी हो रही थी। तभी गली के पार, मीना की खिड़की से, एक जानी-पहचानी आवाज़ आई। तक-तक-तक-तक।
साढ़े छह बज चुके थे। मीना अपनी मशीन पर लौट आई थीं, पर अब उस पर किसी ग्राहक का कपड़ा नहीं था। यह उनका अपना घंटा था, और आज भी उसमें किसी ने दस्तक नहीं दी थी।
राजू ने कान लगाया और मुस्कुराया। "सुन। मशीन चल पड़ी।"
इमरान ने चाय की पहली चुस्की ली। "चेन उतरी, देर हुई, फिर भी किसी का वक्त नहीं टूटा।" राजू ने गिलास भरते हुए कहा, "क्योंकि तूने देर छुपाई नहीं। बताया हुआ वक्त ही काम आया।"
कोई भाषण नहीं हुआ। बस गली के पार मशीन चलती रही।
जो बदला

